इस यात्रा का भावनात्मक पहलू
ऑटिज़्म (ASD) वाले बच्चे की परवरिश एक लंबी यात्रा होती है। कभी बहुत खुशी होती है, कभी उम्मीद, और कई बार थकान, तनाव और उलझन भी। थैरेपी, रोज का रूटीन, घर की जिम्मेदारियाँ, और लोगों के सवाल, सब कुछ संभालते संभालते माता पिता मानसिक रूप से थक जाते हैं। अक्सर दिमाग बस “बड़ा नतीजा” ही सोचता रहता है, जैसे बच्चा कब बोलना शुरू करेगा, कब स्कूल जाएगा, या कब अपने काम खुद करेगा।
लेकिन सच यह है कि ऑटिज़्म में प्रगति ज़्यादातर छोटे छोटे कदमों से बनती है। जो उस समय पर छोटी बात लगती है, वही आगे चलकर बड़े बदलाव की नींव बनती है।
इन छोटे माइलस्टोन को देखना और मनाना बच्चे के लिए भी अच्छा है और माता पिता की हिम्मत के लिए भी बहुत जरूरी है।
छोटे माइलस्टोन क्यों जरूरी हैं
जब बच्चा आँखों से संपर्क करे, नाम बुलाने पर देखे, किसी की क्रिया की नकल करे, या कोई नया शब्द बोले, तो यह “छोटी बात” नहीं है। यह दिखाता है कि बच्चा सीख रहा है और उसका दिमाग धीरे धीरे नई चीजें समझ रहा है।
ऑटिज़्म में ऐसे बदलाव मेहनत और रोज के अभ्यास से आते हैं। जब माता पिता इन छोटे सुधारों को पहचानते हैं और हल्के तरीके से बच्चे को प्रोत्साहित करते हैं, तो बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ता है और सीखने की क्षमता मजबूत होती है।
और यह भी याद रखिए: प्रगति हमेशा सीधी रेखा में नहीं चलती। कभी अचानक सुधार दिखेगा, कभी कई हफ्तों तक धीमा लगेगा। ऐसे समय में छोटे छोटे “जीत” को मानना बहुत मदद करता है।
माता पिता कैसे हिम्मत बनाए रखें
ऑटिज़्म थैरेपी में माता पिता की भूमिका सबसे अहम होती है। आपकी नियमितता, धैर्य और भागीदारी ही असली फर्क बनाती है। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि “कुछ हो ही नहीं रहा।” ऐसे समय में ये बातें याद रखें:
अपनी मेहनत को हल्के में मत लीजिए
हर थैरेपी सत्र, हर रोज का रूटीन, हर बार बच्चे को शांत तरीके से संभालना, यह सब प्रगति का हिस्सा है। आप सिर्फ प्रगति देख नहीं रहे, आप प्रगति बना रहे हैं।
नतीजे नहीं, प्रक्रिया पर ध्यान दें
बच्चे को कोई कौशल सीखने में समय लग सकता है। यह बिल्कुल सामान्य है। तेज़ी से ज्यादा जरूरी है रोज थोड़ा थोड़ा अभ्यास और सहारा देने वाला माहौल।
हर छोटे कदम को मनाइए
नाम पर देख लिया, थोड़ा ज्यादा देर बैठ गया, नया खाना चख लिया, या नई गतिविधि करने की कोशिश की, यह भी प्रगति है। ऐसे कदमों को प्यार और हल्के उत्साह के साथ सराहिए।
तुलना छोड़िए
हर बच्चा अलग होता है। किसी और बच्चे से तुलना करने से सिर्फ तनाव बढ़ता है। अपने बच्चे की गति और उसकी खासियत पर ध्यान रखिए।
थैरेपिस्ट से जुड़े रहिए
नियमित बातचीत से दिशा साफ रहती है। दूसरे माता पिता से बात करने से भी सहारा मिलता है, क्योंकि तब महसूस होता है कि आप अकेले नहीं हैं।
खुद का भी ध्यान रखिए
माता पिता अक्सर खुद को भूल जाते हैं। थोड़ा आराम, अच्छी नींद, और अपने मन को हल्का करने के लिए समय जरूरी है। शांत और संतुलित माता पिता ही बच्चे को सबसे अच्छा सहारा दे पाते हैं।
नजरिया बदलने से बहुत फर्क पड़ता है
ऑटिज़्म की प्रगति सिर्फ कौशल तक सीमित नहीं होती। माता पिता भी इस यात्रा में मजबूत बनते हैं। जो चीजें पहले बहुत भारी लगती थीं, वे धीरे धीरे संभलने लगती हैं।
थैरेपी सिर्फ बच्चे को नहीं सिखाती, पूरे परिवार को धैर्य, समझ और सहनशक्ति भी सिखाती है। हर मुस्कान, हर शांत पल, और हर छोटा बदलाव एक बड़ा कदम होता है।
जब आप यह देखना शुरू करते हैं कि “हम कितना आगे आ चुके हैं,” तो उम्मीद बनी रहती है और नियमितता भी बनी रहती है।
निष्कर्ष
ऑटिज़्म थैरेपी एक लंबी यात्रा है। कभी प्रगति तेज़ लगेगी, कभी धीमी। दोनों ही सामान्य हैं।
माता पिता के लिए सबसे जरूरी है हिम्मत बनाए रखना, छोटे कदमों को पहचानना, और लगातार प्रयास करते रहना। परफेक्शन नहीं, नियमित कोशिश काम करती है।
हर मुस्कान, हर नया शब्द, हर जुड़ाव का पल एक माइलस्टोन है। समय लगेगा, लेकिन हर कदम आपके बच्चे को आत्मविश्वास, स्वतंत्रता और विकास की ओर ले जाता है, और यही असली सफलता है।
यह लेख केवल जानकारी के लिए है। अपने बच्चे के लिए सही योजना बनाने के लिए बाल मनोवैज्ञानिक या ऑटिज़्म विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।
This article is for educational purposes. For better accuracy, consult a Child psychologist or Autism Expert
Regards
Dr. Atul Madaan (Autism Expert)
MAAP, MBA, MPhil (Clin. Psy), PhD (Psy)
Operational Head & Clinical Psychologist- Care For Autism (CFA)
8383849217
www.autismspecialist.co.in
𝐂𝐀𝐑𝐄 𝐅𝐎𝐑 𝐀𝐔𝐓𝐈𝐒𝐌 (CFA)
One-of-a-Kind Assessment & Remedial Training Centre for Special-needs Children.
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